बौद्ध धर्म में चारिका के बहुत ही कठोर नियम है l
भिक्षु सही प्रकार से चीवर को धारण करेगा ; चारिका करते समय इधर-उधर नजर नहीं दौड़ाएगा ; अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हुए किसी भी दरवाजे पर जाकर खड़ा हो जाएगा ; वह ऐसा 3 बार कर सकता है, और यह समय दिन में 12:00 बजे से पहले का होगा ; उस दौरान जो भोजन प्राप्त होगा उसको लेकर वापस आ जाएगा, और अपने निवास स्थान पर भोजन को ग्रहण करेगा.
यदि भिक्षु गुरु के सानिध्य में नहीं रह रहा है तो अपना भोजन किसी के साथ शेयर नहीं करेगा क्योंकि यह दान उसको पूर्व जन्म में जमा की गई पुण्य की पूंजी से प्राप्त होता है, परंतु साथ रह रहे किसी बीमार भिक्षु को भोजन का दान दे सकता हैl
यदि उसको पर्याप्त भोजन नहीं मिलता है या भोजन नहीं मिलता है तो भी निवास स्थान पर वापस लौट आएगा परंतु 4 दरवाजे पर भिक्षाटन के लिए नहीं जाएगा; अगले दिन ही भिक्षाटन के लिए जाएगा.
अगले तीन दिनों तक भिक्षा के लिए वह उन दरवाजा पर नहीं जाएगा जहां पर पिछले बार वह भिक्षा मांग चुका हैl भले ही उसको वहां से भिक्षा प्राप्त हुई हो अथवा ना प्राप्त हुई है चारिका के दौरान भिक्षा देने वालों से नजर नहीं मिलेगाl प्रत्यक्ष रूप में भोजन की मांग नहीं करेगा जब तक की उसकी इस बात का बोध नहीं हो जाता कि सामने वाला व्यक्ति इस परंपरा को नहीं जानता हैl
यदि जानकर भी दाता, उपेक्षा करता है तो मुस्कुराकर, गृह स्वामी की मंगल कामना करते हुए अगले दरवाजे पर बढ़ जाएगाl
भोजन ग्रहण की चर्चा किसी से नहीं करेगा, ना ही किसी दाता का अपमान करेगा और ना ही प्रशंसा करेगाl भले ही किसी घर से उसको भिक्षा मिली हो अथवा ना मिली होl
इसी प्रकार चारिका के अन्य सूक्ष्म नियम भी हैंl वह धम्मपद में दिए नियम सील के सुगंध पर आधारित है !
साधक कमलेश कुमार मित्रा
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