मान्यवर,
हजारों वर्षों से मनुस्मृति इसलिए लागू रही, क्योंकि वह ठीक है इसको दिमाग में भर दिया गया था, आज भी नई मनुस्मृति लागू है जो आप देख नहीं पा रहे हैं l
कहीं पर आप उसका विरोध करते नजर नहीं आते, रविदास राज की बात नहीं करते, सबके सामान भोजन की बात नहीं करते 🙏 अधिकारी कभी नहीं चाहता उसका चपरासी उसके जैसा भोजन खाएं 🙏 भले ही वह अधिकारी दलित बिरादरी का क्यों ना हो🙏
संसद में आज भी मनुस्मृति लागू है, संसदीय कार्य मंत्री का संसद में दिया गया बयान सुन लेवें, जिस दिन देर रात तक संसद चली 🙏
परंतु यह नए प्रकार की मनुस्मृति है, संसद के चार हालों में लोगों के खाने की व्यवस्था अलग-अलग की गई,
अर्थात संसदीय कार्य को देखने के लिए सांसद का कोई साथी संसद में आया है तो वह अपने सांसद के साथ बैठकर खाना नहीं खा सकता था यह संसदीय कार्य मंत्री का संसद के अंदर दिया गया बयान है 🙏
यही परंपरा मैंने बाबा रामदेव के यहां देखी जब मैं उनका विधि सलाहकार/ वैद्यो का सुपरवाइजर होता था l
इस व्यवस्था से दुखी होकर अंतिम रूप से मैं बाबा रामदेव को छोड़ने का निर्णय लिया, क्योंकि इससे हमारे समाज का उत्थान नहीं हो सकता था 🙏
वहां पर हम जैसे वीआईपी लोगों के लिए मेस अलग थी,
डॉक्टर का सुपरवाइजर होने के बावजूद मैं डॉक्टर के साथ भोजन नहीं कर सकता था, और डॉक्टर को अपने भोजनालय में नहीं बुला सकता था 🙏 यह स्वामी गणेशानंद की कठोर नियमावली थी 🙏 जोकि बाबा रामदेव के प्रतिनिधि के रूप में हम लोगों के भोजन की तथा अन्य व्यवस्था देखते थे 🙏
इसको पुरानी वर्ण व्यवस्था से जोड़कर देखेंगे तो यह वही मनुस्मृति दिखाई देगी 🙏
इंडियन टेलिफोन इंडस्ट्री नैनी इलाहाबाद में काम करते हुए भी मैंने इसी प्रकार की वर्ण व्यवस्था देखी, कर्मचारियों का भोजन निम्न कोटि का होता था और अधिकारियों का भोजन उच्च कोटि का होता था, कोई कर्मचारी अधिकारियों के भोजनालय में पैसा देने को तैयार भी होता, तो भी वह अधिकारियों के भोजनालय में जाकर खाना नहीं खा सकता था🙏
काम अभी और ही भी बाकी है, पहले रविदास राज को समझो फिर उसको लागू करो, जो रविदास राज की भावना के अनुकूल न दिखे उसका विरोध करो🙏 केवल घंटा बजा देने से कोई रविदास का शिष्य नहीं हो जाता है 🙏
अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा
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