Saturday, 7 December 2024

अधिवक्ता दिनेश का प्रश्न और उत्तर

 [06/12, 10:19 pm] C91 Adv.Dinesh Singh LL.M. साकेत कोर्ट: भारत के संविधान की उद्देशिका का सटीक विश्लेषण ~


उद्देशिका बनने का इतिहास~


 जब संविधान सभा का गठन कर लिया गया और संविधान सभा के लिए स्थाई अध्यक्ष का चुनाव कर लिया गया उसके बाद देश का संविधान संविधान सभा कैसा बनाएगी इसके संबंध में नेहरू जी ने 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में जोरदार भाषण दिया। 

और उसके बाद नेहरू जी ने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किए। यह उद्देश्य प्रस्ताव सारतः वही उद्देश्य प्रस्ताव थे जिन्हें कांग्रेस पार्टी ने अपने मेरठ के खुले अधिवेशन में 20 नवंबर 1946 को पास किया था।


प्रस्ताव में कहा गया था~


"(1) यह संविधान-सभा अपने इस दृढ़ और गम्भीर संकल्प की घोषणा करती है कि वह भारत को एक स्वतन्त्र प्रभुसत्ता सम्पन्न गणराज्य घोषित करेगी और उसके भावी शासन के लिए एक ऐसे संविधान की रचना करेगी,


(2) जिसके अन्तर्गत वे राज्य क्षेत्र जो ब्रिटिश भारत के अन्तर्गत आते हैं, वे राज्य-क्षेत्र जो अब देशी राज्यों के अन्तर्गत प्राते हैं और भारत के ऐसे अन्य भाग जो ब्रिटिश भारत के बाहर हैं और ऐसे राज्य तथा राज्य क्षेत्र जो स्वतन्त्र प्रभुत्व सम्पन्न भारत के भीतर सम्मिलित होने के लिए प्रस्तुत हैं, घापस में मिलकर एक संघ के रूप में गठित होंगे,


(3) जिसके अन्तर्गत उपर्युक्त राज्य क्षेत्र जिनमें चाहें तो उनकी वर्तमान सीमाएं सम्मिलित हों या अन्य ऐसी सीमाएँ सम्मिलित हों जिनका संविधान सभा भविष्य में संविधान की विधि के अनुसार निर्णय करे, स्वायत्तंशासी एककों की सत्ता से सम्पन्न होंगे और उसे बनाये रखेंगे। उनके पास अवशिष्ट शक्तियाँ होंगी और वे सरकार तथा प्रशासन की सारी शक्तियों का प्रयोग करेंगे तथा उनके सारे कार्य करेंगे। इसके अपवाद केवल वे शक्तियां और कार्य होंगें जो संघ में विहित हों या संघ को सौंपे गये हों ।


(4) जिसके अन्तर्गत प्रभुत्व-सम्पन्न और स्वतन्त्र भारत की, उसके अंगभूत भागों और शासन के अंगों की समूची शक्ति और सत्ता जनता से प्राप्त हुई हों,

(5) जिसके अन्तर्गत विधि तथा सार्वजनिक नैतिकता के अधीन रहते हुए भारत के सभी लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थिति और अवसर की तथा विधि के सम्मुख समानता की, विचार, अभिव्यक्ति पर कु विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय और कार्य की गारण्टी दी जायेगी और उन्हें प्राप्त किया जायेगा,


(6) जिसके अन्तर्गत अल्पसंख्यकों, पिछड़े हुए और कबाइली क्षेत्रों तथा दलित और अन्य पिछड़े हुए वर्गों के लिए उपयुक्त परिवारणों की व्यवस्था को प्रस्त की जायेगी, और


(7) जिसके अन्तर्गत न्याय तथा सभ्य राष्ट्रों की विधि के अनुसार गणराज्य के राज्य-क्षेत्रों की अखण्डता की और जल, समुद्र तथा आकाश पर उसके प्रभुता-अधिकारों की रक्षा की जायेगी, श्रीर


(8) यह प्राचीन देश संसार में अपना न्यायपूर्ण और सम्मान्य स्थान प्राप्त करेगा और विश्वशान्ति तथा मानव जाति के कल्याण के उन्नयन के लिए अपना पूर्ण तथा सहर्ष योग देगा ।"


संविधान सभा में नेहरू जी के द्वारा प्रस्तुत किए गए उद्देश्य प्रस्ताव पर 17 दिसंबर 1946 को बोलने के लिए डॉक्टर अंबेडकर को कहा गया,

बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने अपने विचार व्यक्त करने से पहले कहा था कि इस प्रस्ताव पर बोलने के लिए आपने मुझे आमंत्रित किया है मैं अवश्य ही है स्वीकार करूंगा कि मैं आपका आमंत्रण पाकर मैं आश्चर्यचकित हो गया हूं सूची में 20-22 सदस्यों का नाम मुझ से ऊपर है और इसलिए मैं समझता था कि अगर बोलने का मौका भी मिलेगा तो कल मिलेगा मैं पसंद भी यही करता कि कल बोलने का मौका मिलता क्योंकि आज मैं बिना किसी तैयारी के आया हूं मैं चाहता था कि इस अवसर पर एक विस्तृत वक्तव्य दो और उसके लिए मैं तैयारी कर लेना चाहता था इसके अलावा आपने वक्ताओं के लिए 10 मिनट का समय निर्धारित कर दिया है इन सब और सुविधाओं के बीच में मैं नहीं समझ पाता कि प्रस्तुत प्रस्ताव पर समुचित रूप से किस तरह बोल पाऊंगा।

अपने विचार प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्ताव के पैराग्राफ 5, 6, 7 सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय में कोई विरोधाभास नहीं है, परंतु पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इनकी विशेष व्याख्या नहीं की कि यह न्याय कैसे मिलेगा ? इसलिए यह कहना निराशाजनक है। हमारे देश में बहुत ही दकियानूसी पुरातन पंथी विचारधारा के लोग रहते हैं जो जाति और धर्म को देश से ऊपर मानते हैं संपत्ति और स्वतंत्रता को बिना कानून के हासिल नहीं किया जा सकता है जब तक लोग देश को जाति और धर्म से ऊपर नहीं मानेंगे कृषि और उद्योग धंधों का और भूमिका राष्ट्रीयकरण नहीं होगा तब तक आने वाली सरकारी किस प्रकार सामाजिक न्याय कर सकेंगे यह है कल्पना विहीन है निराशाजनक है उन्होंने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने केवल चुनिंदा सुंदर और विद्वतापूर्ण शब्दजाल को संविधान के उद्देश्य प्रस्ताव में डाला है। यह बहुत ही निराशाजनक है।

             उद्देशिका के पैराग्राफ 4 इसे गणतांत्रिक भी कैसे कहा जा सकता है जबकि आज सभी की भागीदारी नहीं है।( संविधान सभा के सदस्यों के चुनाव के लिए सीमित लोगों को ही मतदान का अधिकार था जिसमें संपत्ति शिक्षा व करदाता होना मुख्य शर्तें थी) जैसा डॉक्टर ने भी कहा था कि मुस्लिम लीग संविधान सभा में उपस्थित नहीं है इसलिए इस सभा को स्थगित कर दिया जाय। (पैराग्राफ 3 लोकतांत्रिक)

लोकतंत्र भी गणतंत्र की तरह विरोधाभासी है लोकतंत्र राज्य का नाम ही नहीं होता बल्कि जब तक लोगों की जीवन पद्धति नहीं बन जाते तब तक कोई राज्य लोकतांत्रिक कैसे हो सकता है लोकतंत्र के तीन अंग होते हैं समता स्वतंत्रता और बंधुता इनमें से एक के भी ना होने पर लोकतांत्रिक व्यवस्था संभव ही नहीं है।

लोकतंत्र की पहली शर्त है समानता जब तक राष्ट्र की अर्थव्यवस्था समाजवाद पर आधारित नहीं होगी तब तक राष्ट्र लोकतांत्रिक होना संभव नहीं है । 

हमारा देश सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक स्तर पर विभाजित है तब यह संविधान लोकतांत्रिक गणराज्य कैसे बनेगा क्या प्रावधान होगा ऐसा पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कुछ नहीं बताया इसलिए पैराग्राफ 3,4 (लोकतांत्रिक गणराज्य) विरोधाभासी है।

कुल मिलाकर बाबासाहेब डॉक्टर अंबेडकर ने इन उद्देश्य प्रस्तावों की भरपूर आलोचना की थी वे इससे पूर्ण रूप से असंतुष्ट थे,

वे इन्हें निराशाजनक बता रहे थे,

 और बाबा साहब ने यह भी कहा था कि इसमें विद्वतापूर्ण चुने हुए शब्दों की भरमार है परंतु ऐसा करने का कोई प्रावधान नहीं बताया कि यह कैसे होगा ? इसे संविधान में लागू कैसे करेंगे ???

 इसलिए नेहरू जी के द्वारा प्रस्तुत उद्देश्य प्रस्ताव निराशाजनक है।


उद्देशिका किसी भी किताब का पूर्ण परिचय करवाती है किताब में क्या-क्या लिखा है यह बात हम उस किताब की उद्देशिका पढ़कर आसानी से जान जाते हैं लेकिन यह बात भारत के संविधान की उद्देशिका के बारे में कतई सत्य नहीं है, इस बात को मैं संविधान की उद्देशिका के एक-एक शब्द का विश्लेषण करके यह समझाने का प्रयास करूंगा कि जो संविधान की उद्देशिका में लिखा है वह भारत के संविधान में किसी भी अनुच्छेद में प्रावधान नहीं किया गया है।

भारत के संविधान की उद्देशिका बर्मा के संविधान की उद्देशिका की नकल है ~


बर्मा का संविधान सर बीएन राव ने बनाया था सर बीएन राव ने ही भारत के संविधान का असली ड्राफ्ट बनाकर तैयार किया था, जिस पर संविधान सभा में बहस हुई थी, इसी संविधान में संशोधन संविधान सभा ने किए थे।


बर्मा के संविधान की उद्देशिका पढ़िए ~ 


THE CONSTITUTION

THE UNION OF BURMA.


OF


PREAMBLE.


WE, THE PEOPLE OF BURMA including the Frontier

Arcas and the Karenni States, Determined to establish

in strength and unity a SOVEREIGN INDEPENDENT

STATE, To maintain social order on the basis of the eternal

principles of JUSTICE, LIBERTY AND EQUALITY and

To guarantee and secure to all citizens JUSTICE social,

economic and political; LIBERTY of thought, expression,

belief, faith, worship, vocation, association and action;

EQUALITY of status, of opportunity and before the law,

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this Tenth day of

Thadingyut waxing, 1309 B.E. (Twenty-fourth day of

September, 1947 A.D.), DO HEREBY ADOPT, ENACT

AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.


अब भारत के संविधान की उद्देशिका पढ़िए~


THE CONSTITUTION OF INDIA

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly

resolved to constitute India into a 1[SOVEREIGN

SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC] and

to secure to all its citizens:

JUSTICE, social, economic and political;

LIBERTY of thought, expression, belief, faith and

worship;

EQUALITY of status and of opportunity;

and to promote among them all

FRATERNITY assuring the dignity of the individual

and the 2[unity and integrity of the Nation];

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this twenty-

sixth day of November, 1949, do HEREBY ADOPT,

ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS

CONSTITUTION.


क्या संविधान की उद्देशिका बाबा साहब डॉ अंबेडकर ने लिखी है ??? 


भारत के संविधान की उद्देशिका बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने नहीं लिखी है, अब आपको बता दें जब बाबा साहब डॉ अंबेडकर को लग गया था कि अब वे संविधान सभा में नहीं जा पाएंगे। तब उन्होंने अपने लोगों के अधिकारों के रक्षा उपायों को सुनिश्चित करने के लिए 15 मार्च1947 को संविधान सभा को दिया था जो संविधान के रूप में था। जिसमें संविधान की प्रस्तावना, मूल अधिकार, राजकीय समाजवाद आदि महत्वपूर्ण चीजें प्रस्तावित थी। हम यहां केवल बाबा साहब डॉ अंबेडकर के द्वारा प्रस्तावित प्रतावना पर चर्चा करेंगे।

प्रस्तुत है बाबा साहब डॉ अंबेडकर के विचारों के असली संविधान राज्य और अल्पसंख्यक की प्रस्तावना~

संयुक्त राज्य भारत का संविधन


प्रस्तावित उद्देश्यका


प्रांत और केन्द्र प्रशासित क्षेत्र नामक प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित ब्रिटिश भारत राज्य क्षेत्रों के और देशी राज्यों के राज्य क्षेत्रों के हम लोग, इन राज्य क्षेत्रों का एक परिपूर्ण संघ बनाने की दृष्टि से यह आदेश करते हैं कि प्रांत और केन्द्र प्रशासित क्षेत्र (जिन्हें बाद में राज्य कहा जाएगा) तथा देशी राज्य एक साथ मिलकर संयुक्त राज्य भारत नाम से विधायी कार्यकारी और प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए एक राज-निकाय का गठन करेंगे और इस प्रकार निर्मित संघ अविघटनीय होगा तथा इसका उद्देश्य इस प्रकार होगा :


(i) अपने लिए और अपनी भावी पीढ़ियों के लिए संपूर्ण संयुक्त राज्य भारत में स्वशासन तथा सुशासन, दोनों का वरदान प्राप्त करना,


(ii) प्रत्येक देशवासी के जीवन स्वतंत्रता तथा सुख प्राप्त करने और


वाक् - स्वातंत्र्य एवं धर्म-स्वातंत्र्य संबंधी अधिकार का अनुरक्षण करना,


(iii) सुविधा-वंचित वर्गों को बेहतर अवसर सुलभ कराते हुए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विषमता को दूर करना,


(iv) प्रत्येक देशवासी के लिए अभाव और भय से मुक्ति दिलाने को संभव बनाना, और


(v) आंतरिक अव्यवस्था और बाह्य आक्रमण को रोकने की व्यवस्था करना ।


उपर्युक्त से हम संयुक्त राज्य भारत के लिए इस संविधान की स्थापना करते हैं।


बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के विचारों का असली संविधान भारत सरकार ने बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के जो वॉल्यूम छपवाए हैं उनमें वॉल्यूम नंबर दो पेज नंबर 157 ( नया संस्करण ) और पुराने संस्करण में वॉल्यूम नंबर 2 में पेज नंबर 167 पर बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के विचारों का असली संविधान दिया हुआ है, जिसके बारे में ज्यादातर अंबेडकरवादी वाकिफ नहीं हैं।

आप सच्चाई जानने के लिए बाबा साहब डॉ अंबेडकर के विचारों के असली संविधान को पढ़िए…..


भारत के संविधान की उद्देशिका को समझने के लिए आइए सबसे पहले हम भारत के संविधान की उद्देशिका पढ़ते हैं…..


हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए 

तथा,

उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए,

दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"


संविधान के उद्देशिका की शुरुआत हम भारत के लोग शब्द से होती है हम भारत के लोग कौन हैं इसे समझने के लिए हम संविधान के उद्देशिका का प्रथम पैरा पढ़ते हैं …


हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

उद्देशिका का प्रथम पैरा कहता है कि हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को….

बस यहीं से संदेह की शुरुआत होती है हम भारत के लोग यदि संविधान की उद्देशिका बना रहे हैं संविधान बना रहे हैं तो उसके समस्त नागरिकों को शब्दावली का प्रयोग क्यों करेंगे ??? 

फिर पूरा पैरा इस प्रकार होगा….

"हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए और अपने आप को…….."

क्योंकि हम भारत के लोग जो भी चीजें दे रहे हैं वह अपने आप को दे रहे हैं इसलिए यहां व्याकरण के रूप से अपने आपको शब्द प्रयोग होगा न कि समस्त नागरिकों को यदि हम भारत के संविधान की उद्देशिका का इंग्लिश वर्जन पढ़ते हैं तो उसमें शब्दावली का प्रयोग है "We the people….. इंग्लिश के व्याकरण के नियमानुसार यदि noun we the people है तो pronoun 'us' का प्रयोग होगा न कि 'aal its citizen'

हम भारत के लोग शब्द को अंतिम पैरा के साथ मिलाकर पढ़ा गया तो वह इस प्रकार से है ~

हम भारतके लोग……...दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

जब हम भारत के लोग शब्द को अंतिम पैरा के साथ मिलाकर पढ़ा जाए तो स्पष्ट होता है कि हम भारत के लोग दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज 26 नवंबर 1949 को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं,

और भारत के संविधान को संविधान सभा में अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित किया है संविधान सभा के लोगों ने…… ना कि हम भारत के लोगों ने क्योंकि संविधान सभा में संविधान सभा के लोग थे….

"हम भारत के लोग नहीं।

अब हम -

(1)"हम भारत के लोग" शब्दावली को समझते हैं~

24 मार्च 1946 को तीन सदस्यों का मंत्री मिशन (कैबिनेट मिशन) नई दिल्ली आया मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी योजना प्रकाशित की तो उसने भारत के संविधान को बनाने के लिए संविधान सभा के गठन के लिए बहुत से नियम और शर्तें तय की थी, उन नियम और शर्तों में एक शर्त यह भी थी कि संविधान सभा का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा….

मंत्री मिशन के द्वारा संविधान सभा के संगठन के संबंध में कांग्रेस पार्टी को जब उसकी रिपोर्ट प्राप्त हुई तो कांग्रेस पार्टी ने यह कहकर आपत्ति खड़ी कर दी वयस्क मताधिकार के आधार पर हम संविधान सभा का चुनाव कराएंगे तो उसके लिए हमें नए सिरे से वोटर लिस्ट बनानी पड़ेगी उसमें हमारा बहुत समय खराब हो जाएगा और इस प्रकार हम हम संविधान सभा के गठन में ही बहुत समय लगा देंगे, तो संविधान बनने में देरी हो जाएगी और इस प्रकार भारत को आजादी मिलने में बहुत देर हो जाएगी, इसलिए निर्वाचन की जो प्रक्रिया है वह 1935 के भारत सरकार अधिनियम के अनुसार दिए गए मताधिकार के आधार पर ही होगी।

अंग्रेजों ने 1935 में भारत सरकार अधिनियम बनाकर वोट डालने का अधिकार केवल उन्हीं लोगों को दिया ~

1. जिनके पास अचल संपत्ति हो।

2. जो सरकार को टैक्स देते हों।

3. जो कम से कम अपर वर्णाकुलम(हाई स्कूल) तक पढ़े लिखे हों।


इन तीन शर्तों के आधार पर लगभग 90 फ़ीसदी आबादी वोट डालने के अधिकार से वंचित थी क्योंकि ज्यादातर भारतीय इन तीन शर्तों को पूरा ही नहीं कर पाते थे।

इन तीन शर्तों के आधार पर साढ़े 11%लोगों को ही वोट डालने का अधिकार था।

1931 की जनगणना के अनुसार उस समय भारत की आबादी 25 करोड़ 60 लाख थी जिसमें से महज तीन करोड़ लोगों को वोट डालने का अधिकार था।

1935 के अधिनियम की शर्तों के अनुसार वोट डालने का अधिकार उन्हीं लोगों को था जो उन तीन शर्तों को पूरा करते हो इस हिसाब से जमींदार,रियासतदार,राजा, रजवाड़े, पूंजीवादी और सावंतवादी लोगों को ही वोट डालने का अधिकार था, और वंचित वर्ग के पढ़े लिखे लोगों भी को वोट डालने का अधिकार था,परंतु वंचित वर्ग में पढ़े-लिखे लोग न के बराबर थे।

जब इस आधार पर संविधान सभा का गठन हुआ तो तो भारत का लगभग 90 फ़ीसदी तबका जिसमें ज्यादातर वंचित वर्ग ही था, वोट डालने के अधिकार से वंचित था।

इस प्रकार संविधान सभा में भारत के लगभग 90 फ़ीसदी लोगों का कोई प्रतिनिधि चुनकर नहीं पहुंच पाया।

हम भारत के 90 फ़ीसदी लोग वोट डालने के अधिकार बंद से वंचित थे,

तो वे संविधान सभा में कैसे कह सकते हैं कि "हम भारत के लोग…….."

संविधान सभा के पूंजीवादी और सावंतवादी लोगों ने "हम भारत के लोग" शब्दावली को हमें भ्रमित करने के लिए रखा है,

यदि वे हम संविधान सभा के लोग शब्दावली का प्रयोग करते तो उनकी पोल खुल जाती और भारत की 90 फ़ीसदी आबादी इस बात को आसानी से समझ पाती कि हमारे लोगों को तो वोट डालने का अधिकार ही नहीं था, इस प्रकार संविधान सभा में हमारा कोई प्रतिनिधित्व नहीं था,

जब हमारा प्रतिनिधित्व नहीं था इसीलिए हमें हमारे हक अधिकारों से वंचित रखा गया है, तब फिर भारत की भोली-भाली जनता 90 फ़ीसदी वंचित वर्ग यह समझने का प्रयास करता यह संविधान किसने बनाया है ??? और किसके फायदे के लिए बनाया है ???

संविधान निर्माण कैसे हुआ ??? इसे समझने का प्रयास वंचित वर्ग अवश्य करता ???


(2) भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणराज्य बनाने के लिए~ 


संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न का मतलब होता है कोई भी देश किसी विदेशी शक्ति के अधीन नहीं होगा अर्थात विदेशी शक्ति के नियंत्रण से मुक्त होगा । संविधान सभा के अंदर संविधान सभा के लोग इस बात का संकल्प ले रहे हैं कि हम भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणराज्य बनाएंगे। अब प्रश्न उठता है क्या संविधान सभा संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न थी ???

इसका जवाब है संविधान सभा संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न नहीं थी, क्योंकि संविधान सभा का गठन अंग्रेजी हुकूमत के आदेशानुसार हुआ था। जब संविधान सभा ही प्रभुत्व संपन्न नहीं थी तो वह भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न बनाने वाला संविधान कैसे बना सकती है ???

 संविधान के अनुच्छेद 147 के अनुसार भारत आज भी कानूनी तौर पर अंग्रेजों के नियंत्रण के अधीन है। हमें 1947 में जो आजादी मिली है वह भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के प्रावधानों के अनुसार मिली है यह कानून अंग्रेजो ने बनाया है और यह कानून भारत पर लागू है और इतना ही नहीं भारत शासन अधिनियम 1935 के प्रावधान भारत पर आज भी कानूनी रूप से लागू है तो यह कह देना कि भारत विदेशी सत्ता के हस्तक्षेप से मुक्त है यह एक बेईमानी है, अंग्रेज अपने द्वारा बनाए हुए भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 को कभी भी वापस ले सकते हैं जैसे ही वे इस अधिनियम को वापस लेंगे तो भारत कानूनी रूप से फिर से उनका गुलाम बन जाएगा। वास्तविक सच्चाई यह है कि भारत संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणराज्य नहीं है। 

भारत आज भी कानूनी रूप से अंग्रेजों के नियंत्रण में है। अंग्रेज आज भी भारत पर अपने एजेंटों के द्वारा संविधान संविधान के माध्यम से शासन कर रहे हैं।


(3) भारत को एक समाजवादी गणराज्य बनाने के लिए~ संविधान की उद्देशिका 26 नवंबर 1949 को बनाई गई यह तारीख संविधान की उद्देशिका में ही दी गई है,

और समाजवादी शब्द 42 वें संविधान संशोधन के द्वारा सन् 1976 में जोड़ा गया था यह शब्द संविधान की मूल उद्देशिका में नहीं था जब यह शब्द संविधान की मूल उद्देशिका में नहीं था तो इसके अनुसार संविधान कैसे बन जाएगा संविधान बनकर तैयार 26 नवंबर 1949 को हो गया था और लागू हुआ 26 जनवरी 1950 को और समाजवादी शब्द जोड़ा गया सन 1976 में तब आप बताएं संविधान सभा के लोग संविधान में समाजवादी व्यवस्था कैसे किए होंगे ???

और दूसरी बात यह है कि जब यह शब्द सन 1976 में जोड़ा गया तब इसके अनुरूप संविधान कैसे बन गया होगा ??? यह बहुत ही हास्यास्पद बात है, कांग्रेस पार्टी की सरकार ने समाजवादी शब्द को संविधान की उद्देशिका में भारत के 90 फ़ीसदी वंचित वर्ग के लोगों को गुमराह करने के लिए जुड़ा हुआ है यह समझने की जरूरत है ना कि भारत की अर्थव्यवस्था समाजवादी है।

समाजवाद का मतलब होता है कि देश के उत्पादन के संसाधन सरकार के नियंत्रण के अधीन होंगे।

लेकिन समाजवाद के संबंध में भारत के संविधान में कोई भी प्रावधान नहीं है इसी वजह से वर्तमान की मोदी सरकार सरकार की ज्यादातर संस्थाओं का निजीकरण कर चुकी है…


(4) भारत को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनाने के लिए ~ धर्मनिरपेक्ष शब्द को भी 42 वें संविधान संशोधन के द्वारा सन् 1976 में जोड़ा गया। धर्मनिरपेक्ष का मतलब होता है कि सरकार सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखेगी और किसी धर्म को आगे बढ़ाने के लिए किसी प्रकार का सहयोग नहीं देगी अर्थात सरकार धर्म के मामलों में तटस्थ रहेगी।

लेकिन भारत के संविधान में ऐसा कुछ भी नहीं है क्योंकि यह शब्द बाद में जोड़ा गया और संविधान सभा ने संविधान बनाने की प्रक्रिया 9 दिसंबर 1946 से शुरू की और यह 26 नवंबर 1949 को बनकर तैयार हो गया था, इस दौरान भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ मुस्लिमों को पाकिस्तान दिया गया और हिंदुओं के लिए भारत जब देश का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ तो संविधान सभा के लोगों ने उस समय धर्मनिरपेक्ष संविधान बनाने की सूची भी नहीं थी भारत का संविधान एक हिंदूवादी संविधान है इसके संबंध में संविधान के अनुच्छेद 290(क) वह भी आप पढ़ सकते हैं~


290(क) कुछ देवस्वम निधियों को वार्षिक संदाय ~ प्रत्येक वर्ष 46 लाख ₹50000 की राशि केरल राज्य की संचित निधि पर भारत की जाएगी और उस निधि में से तिवांकुर देवस्वम निधि को संदत्त की जाएगी और प्रत्येक वर्ष 13 लाख ₹50000 की राशि तमिलनाडु राज्य की संचित निधि पर भारत की जाएगी और उस निधि में से 1 नवंबर 1956 को उस राज्य को तिवांकुर-कोचीन राज्य से अंतरित राज्य क्षेत्रों के हिंदू मंदिरों और पवित्र स्थानों के अनुरक्षण के लिए उस राज्य में स्थापित देवस्वम निधि को संदत्त की जाएगी।

अनुच्छेद 290 का को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है जो हिंदू धर्म को आगे बढ़ाने के लिए सरकार से सरकार की संचित निधि से हिंदू मंदिरों और हिंदुओं के पवित्र स्थानों के अनुरक्षण के लिए निम्नलिखित निधि देता है।

उपरोक्त के आधार पर हम कह सकते हैं कि संविधान की उद्देशिका में संशोधन करके धर्मनिरपेक्ष शब्द हमें गुमराह करने के लिए मूर्ख बनाने के लिए जोड़ा गया है जबकि भारत का संविधान वास्तव में हिंदुओं के हित में लिखा गया संविधान है न कि धर्मनिरपेक्ष संविधान ???


(5) भारत को एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए~ संविधान की उद्देशिका में दिया गया लोकतंत्रात्मक शब्द भी अपने आप में बहुत ही भ्रामक है भारत में मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का चुनाव लोकतंत्रात्मक पद्धति से नहीं होता है लोकतंत्रात्मक पद्धति से होता तो जनता अपनी पसंद का मुख्यमंत्री चुनती और अपनी पसंद का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति चुनती…

भारत की जनता को अपनी पसंद का मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति चुनने का कोई भी अधिकार नहीं है भारत की जनता सीधे तौर पर विधायक और सांसदों का चुनाव कर सकती है इससे ज्यादा कुछ नहीं….

जनता की शक्ति चुनाव के बाद खत्म हो जाती है अब यह शक्ति आ जाती है विधायक और सांसदों के पास मूल रूप से पार्टी के पास! पार्टी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुन देती है उसी को विधायक या सांसद मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुनने के लिए बाध्य होते हैं!

जैसे ही विधायक और सांसद मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को चुनते हैं फिर उनकी शक्ति खत्म हो जाती है ।

कुल मिलाकर भारत में मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री राष्ट्रपति का चुनाव डायरेक्टली नहीं होता इस तरह से यहां सीधा लोकतंत्र नहीं! बल्कि छद्म लोकतंत्र है।

और भारत के 90 फ़ीसदी वंचित वर्ग के लोग इस बात का गुणगान करते नहीं थकते हैं कि भारत में लोकतंत्र है क्योंकि वह इस सच्चाई से अनजान हैं।


(6) हम भारत के लोग उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त कराने के लिए~ सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय यह शब्दावली बहुत ही भयानक है! गुमराह करने वाली है!! लोगों को मूर्ख बनाने वाली है !!!

सामाजिक न्याय क्या होता है ???

आर्थिक न्याय क्या होता है ???

राजनीतिक न्याय क्या होता है ???

यहां न्याय शब्द हमें भ्रमित करने के लिए रखा गया है जबकि यहां शब्द होना चाहिए था "समानता" अर्थात सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक समानता ?

25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने बोलते हुए कहा था कि~ "हम 26 जनवरी 1950 को विरोधाभास के जीवन में प्रवेश करेंगे जहां राजनीतिक और तौर पर तो समानता होगी एक आदमी का एक वोट और एक वोट की एक कीमत होगी लेकिन हम सामाजिक और आर्थिक तौर पर विषमता का जीवन जीना स्वीकार करेंगे यदि इस विषमता को अतिशीघ्र दूर नहीं किया गया तो वे लोग जो सामाजिक और आर्थिक विषमता के शिकार होंगे आने वाले समय में लोकतंत्र की इस रचना का जो संविधान सभा ने बनाई है उसका विध्वंस कर देंगे"

बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर तो कह रहे हैं कि इस संविधान से हमें केवल राजनीतिक समानता मिली है इस संविधान के द्वारा सामाजिक और आर्थिक गैर बराबरी को दूर नहीं किया गया है ?

लेकिन 90 फ़ीसदी वंचित लोग सामाजिक,आर्थिक, राजनीतिक शब्दों के साथ जुड़े हुए न्याय शब्द को पढ़कर गुमराह होते हैं!

उनको लगता है कि संविधान के द्वारा सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिया गया है वे यह नहीं सोच पाते कि इस संविधान से सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक बराबरी प्रदान नहीं की गई है हम सामाजिक और आर्थिक तौर पर आज भी विषमता के शिकार हैं।

तभी तो बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने 18 मार्च 1956 को आगरा में जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा था~

जनसमूह से ~ तुम्हें एकजुट होकर निरंतर संघर्ष करना होगा और तुम्हें सामाजिक,आर्थिक और शैक्षणिक गैरबराबरी मिटाने के लिए हर प्रकार की कुर्बानी देने के लिए यहां तक कि खून बहाने के लिए भी तैयार रहना होगा।

यदि संविधान के द्वारा सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक गैर बराबरी को मिटा दिया जाता अर्थात हमें सामाजिक,आर्थिक और शैक्षणिक समानता प्रदान कर दी जाती तो बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर यह बात आगरा में कभी नहीं कहते ???

लेकिन

 मूर्ख तो हम ही है जो संविधान की उद्देशिका को पढ़कर अपने आप को संविधान विशेषज्ञ समझने लगते हैं।

 गलती हमारी ही है कि हमने संविधान को कभी ढंग से समझने का प्रयास नहीं किया हमने यह तक जानने का प्रयास नहीं किया कि हमारा संविधान आखिर बना कैसे है ???


(7) विचार,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त कराने के लिए ~ यह शब्दावली भी हमें गुमराह करने वाली है स्वतंत्रता आबाध होती है। उस पर किसी भी तरीके का प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता

 है ??? कोई शर्त नहीं लगाई जा सकती है ???

स्वतंत्रता पर जैसी प्रतिबंध या शर्त लगाई जाती है तो वह स्वतंत्रता नहीं कही जा सकती है भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) में विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है, जो शर्तों के अधीन है अर्थात एक हाथ से स्वतंत्रता दी गई है दूसरे हाथ से छीन ली गई है अनुच्छेद 19 (2) के द्वारा अनुच्छेद 19 (1) में दी गई स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाया गया है। इस प्रकार से विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सरकार के रहमों करम पर टिकी हुई है।


(8) विश्वास,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्राप्त कराने के लिए ~ यह तीनों एक ही शब्द है हमें गुमराह करने के लिए और मूर्ख बनाने के लिए इसे अनावश्यक रूप से तीन बार लिखा है, विश्वास ही धर्म होता है धर्म ही उपासना होती है उपासना ही धर्म और विश्वास होता है। अंग्रेजी के 3 शब्द faith,belief and worship, synonyms हैं, 3 शब्दों को बेवजह रखा गया है जबकि एक शब्द से काम चल सकता था। 


(9) प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए ~ प्रतिष्ठा और अवसर की समानता कैसे प्राप्त करवा सकते हैं एक चपरासी की प्रतिष्ठा और एक प्रोफेसर की प्रतिष्ठा कभी समान नहीं हो सकती है एक हाईस्कूल पास व्यक्ति को और एक पोस्ट ग्रेजुएट को किस तरह से अवसर की समानता दी जा सकती है ???

प्रतिष्ठा की समानता तो कतई प्रदान की ही नहीं जा सकती !!!

 फिर संविधान निर्माताओं ने संविधान की उद्देशिका में प्रतिष्ठा और अवसर की समता देने की बात क्यों कही है ???

निश्चित रूप से हमें बेवकूफ बनाने के लिए ???


(10) तथा उन सब में राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए ~ राष्ट्र की एकता के लिए भारत के संविधान में एक भी अनुच्छेद नहीं है और ना ही अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए एक भी शब्द है।

अखंडता शब्द श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1976 में 42 वें संविधान संशोधन के द्वारा जोड़ा था और इंदिरा गांधी का आपातकाल का दौर जब लोग याद करते हैं तो उनकी रूह कांप जाती है। 

अखंडता शब्द बहुत ही भयानक और तानाशाही से भरा हुआ शब्द है इस शब्द से ही भारत एक पुलिस स्टेट या आर्मी स्टेट बन जाता है,

अखंडता का मतलब है कि हमें देश को टूटने से बचाना है यहां यह नहीं बताया गया देश को कोई बाहरी शक्ति तोड़ने का प्रयास करें तब बचाना है या आंतरिक अशांति फैले उससे बचाना है। सरकारी अखंडता के नाम पर आंदोलनकारियों को गोलियों से भुनवा देती है…लोगों को मरवा देती है सरकार अखंडता का सहारा लेकर किन्ही भी लोगों को देशद्रोही और आतंकी करार देकर मरवा सकती है,

श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश की अखंडता का वास्ता देकर देश के जितने भी विपक्षी नेता थे उनको जेलों में ठूंस दिया था कई नेता तो अपने आप को बचाने के लिए भूमिगत रहे थे।

अब यहां प्रश्न यह उठता है कि हम भारत के लोग ऐसा संविधान क्यों बनाएंगे ? 

और उसके साथ द्वारा ऐसी सरकार क्यों बनाएंगे ?? 

जो हमें ही गोली मार दे हमारी मांग को ही स्वीकार नहीं करें हमारे खिलाफ कानून बनाकर हमारे हक अधिकारों को लूटे हमारे हक अधिकारों पर डकैती डाले हमें बेबस और लाचार बना दे…

जब हम अपने हक की आवाज़ बुलंद करें तो हमें जेलों में ढूंढ ले और हमें गोलियों से मरवा दे….

निश्चित रूप से हम भारत के लोग संविधान बनाते तो इस तरह की तानाशाही व्यवस्था को कतई नहीं बनाते हम भारत के लोग शब्द हमें गुमराह करने के लिए रखा गया है जबकि भारत का संविधान मुख्य रूप से पूंजीवादी और ब्राह्मणवादी ताकतों के द्वारा बनाया गया है यह संविधान विशुद्ध रूप से पूंजीवादी और ब्राह्मणवादी संविधान है जिसके द्वारा पूंजीवादी और ब्राह्मणवादी लोगों ने अपनी व्यवस्था को बचाए रखने के भरपूर इंतजाम किए हैं।

90 फ़ीसदी वंचित वर्ग के लोग जनक कानून की समझ भी नहीं है वह संविधान की उद्देशिका को पढ़ कर के यह समझते हैं कि जैसे वह कानून के अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान हैं और उन भोले भाले लोगों को लगता है किस संविधान की उद्देशिका में से चुने हुए शब्द रखे हैं तो यह सब संविधान में अंदर भी होंगे।

(11) उद्देशिका में तारीख लिखी गई है 26 नवंबर 1949 को इस संविधान को एतद् द्वारा अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं, इसका मतलब यह है संविधान की उद्देशिका 26 नवंबर 1949 को लिखी गई है, जबकि उद्देशिका पहले लिखी जानी चाहिए थी। प्रिएंबल का मतलब ही होता है पहले की। लेकिन यह तो सबसे अंत में लिखी गई है इसलिए इसे लास्ट एंबल होना चाहिए।

(12) उद्देशिका निश्चित रूप से उद्देश्य प्रस्ताव में से ही बनी है उद्देश्य प्रस्ताव संविधान सभा में 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत किए गए थे जिन्हें 22जनवरी 1947 को स्वीकार कर लिया गया था,

जो इस बात का संदर्भ था वह भी प्रस्ताव में लिखा है हम उसी के अनुरूप संविधान बनाएंगे। लेकिन विडंबना इस बात की है जब संविधान बनकर तैयार हो गया है, उसके बाद उद्देशिका में संशोधन किया जा रहा है केवल मूर्ख बनाने के लिए।

उद्देशिका में जो शब्द जोड़े जा रहे हैं वह संविधान के अंदर किसी भी अनुच्छेद में नहीं लिखे गए हैं। इसका मतलब हमें संविधान बनने के बाद भी गुमराह किया गया है।

उद्देशिका में अंतर्निहित शब्दों की व्याख्या करने की मैंने भरपूर कोशिश की है आशा है कि आपको संविधान की उद्देशिका समझ में आई होगी।

आपके मन का यह वहम कि संविधान बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने लिखा है संविधान सभा में उनके द्वारा दिए गए 17 दिसंबर 1946 के भाषण के महत्वपूर्ण अंशों को पढ़कर निश्चित रूप से दूर हुआ होगा।

अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम भारत के संविधान को ढंग से समझें !

संविधान का निर्माण किसने किया है ??? 

और संविधान से हमें क्या मिला है ???

यह सब समझने के लिए हम संविधान सभा की डिबेट को पढ़ें !

खुद जागरूक हो और अपने भाइयों को भी जागरूक करें !


 दिनेश सिंघ एलएल.एम.

      9977300997

           नई दिल्ली

[08/12, 9:05 am] kamleshmittra: 🌹अधिवक्ता दिनेश जी मैंने आपके लंबे लेख को पढ़ लिया है🙏


1. लगता है इस लेख को एक वादी अथवा प्रतिवादी वकील की मानसिकता से लिखा गया है, वकील वादी का होता है या प्रतिवादी का, उसे जो सिद्ध करना होता है सबूत के आधार पर वही सिद्ध करने का प्रयास करता है ऐसा ही लोअर कोर्ट में होता है, अर्थात उसका जो माइंडसेट सेट होता है, वह पूरी ऊर्जा उसी को स्थापित करने में लगा देता है 🙏


2. परंतु माननीय सर्वोच्च न्यायालय में ऐसा नहीं होता है, माननीय सर्वोच्च न्यायालय प्राकृतिक न्याय के आधार पर विधिक न्याय को स्थापित करने की कोशिश करता है, भारतीय संविधान वह दस्तावेज है जो माननीय सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा करने की शक्ति प्रदान करता है, संविधान के आर्टिकल 141 और 142 की शक्ति असीमित है, जो माननीय सर्वोच्च न्यायालय को विधिक न्याय से लेकर प्राकृतिक न्याय तक अपनी बात कहने का अधिकार देता है, 

3. यह दूसरी बात है कि उसकी बात, आदेश, निर्देश को एग्जीक्यूट करने का काम कार्यपालिका के अनुपलकों के पास ही है🙏 कुछ पूर्व माननीय जजों की मूर्खता के कारण न्यायपालिका की डिपेंडेंसी कार्यपालिका के पदेन एग्जीक्यूटिव्स पर अधिक बढ़ गई है, जबकि संविधान के अनुसार राष्ट्रपति और न्यायपालिका का चोली दामन का साथ है, संसद राष्ट्रपति का पुत्र है, और मंत्री परिषद सहित एग्जीक्यूटिव सौतेला भाई 🙏 यह मेरे देखने का दृष्टिकोण है आपका कुछ अलग हो सकता है😂 जनता पार्टी की सरकार ने जिस प्रकार से राष्ट्रपति की शक्ति को कमजोर किया था उसके कारण न्यायपालिका की शक्ति भी घट गई, यह एक लंबी चर्चा है उसको फिर कभी देखेंगे 🙏


4. माननीय सर्वोच्च न्यायालय में निर्णय का आधार या तो प्राकृतिक न्याय होता है या विधिक न्याय होता है🙏 और कोई भी अधिवक्ता ना तो वादी का होता है ना ही प्रतिवादी का, AOR को कोर्ट का ऑफिसर कहा जाता है, केवल उनको ही कोर्ट में केस फाइल करने का अधिकार होता है, उनका कर्तव्य सुप्रीम कोर्ट नियमावली 2013 से नियंत्रित होता है🙏


5. रिजुडिशिकेटा का सिद्धांत आपने पढ़ा होगा, प्रिंसिपल ऑफ बिल के सिद्धांत को भी आपने पढ़ा होगा 🙏 किसी भी अधिवक्ता को इन मूल अवधारणाओं को नहीं भूलना चाहिए 🙏


6. मैंने पिछली चर्चा में भी कहा था संविधान एक कलेक्टिव डॉक्यूमेंट है, जो कि तत्कालीन भारत के प्रतिनिधियों द्वारा शर्तो के अधीन भारत में विलय को दर्शाता है🙏वह भारत के लोग ही थे जिन्होंने भारत में विलय होना सशर्त स्वीकार कर लिया था🙏 राजाओं रजवाडों का विलय पत्र भी संविधान का अंग है, केवल संविधान सभा की डिबेट को ही ना देखें, पीवी पर्स को भी देखें😂 


7. जिन्होंने भारत में विलय स्वीकार नही किया वह पाकिस्तान चले गए🙏 हरि सिंह, हैदराबाद के निजाम, जूनागढ़ के राजा हम भारत के लोग में सम्मिलित नहीं थे, पटेल जी ने उनको प्यार से सम्मिलित किया 😂


8. आप एक वकील है आपके कंधों पर एक महत्वपूर्ण जिम्मेवारी है देश के विद्वानों में गिनती होती है🙏हर आदेश को लिखने से पहले जज को भी आपको विद्वान अधिवक्ता लिखना पड़ता है🙏वह अधिवक्ता की उपस्थिति विद्वान अधिवक्ता लिखकर ही करता है 🙏


9. क्योंकि वह यह मान कर चलता है कि कोई भी अधिवक्ता उसको गुमराह नहीं करेगा, साक्ष्यो की सही व्याख्या करेगा और सही निर्णय पर पहुंचने में सहयोग करेगा🙏 

10. इसी प्रकार समाज भी अधिवक्ता से बहुत सी अपेक्षाएं करता है यह दूसरी बात है कि समाज अधिवक्ता के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन नहीं करता है, अधिवक्ता की वृत्ति जीवन निर्वहन की वृति नहीं है 🙏 बल्कि समाज को न्याय दिलाने का जुनून है 🙏


11. जिस प्रकार आपने पिछली बार मुझ पर आरोप लगाया कि मैं अंबेडकरवादी हूं, और आप मेरी सोच बदल देंगे, यह आपका अंतिम लक्ष्य था🙏 अंबेडकरवाद के संबंध में जो चिर परिचित अवधारणा चल रही है, उससे मेरा कोई लेना देना नहीं है 🙏


12. आपका डॉक्यूमेंट पढ़कर मुझे अच्छा लगा, क्योंकि इस पर बहुत काम किया गया है, परंतु मेरी सोच यथावत है, क्योंकि डॉक्यूमेंट के इंटरप्रिटेशन में आपसे त्रुटि हुई है🙏अपने उन बिंदुओं को छोड़ दिया, जिसके कारण मैं इसको कलेक्टिव डॉक्यूमेंट कहता हूं🙏 

13. भारत जैसे विशाल देश के निर्माण में इससे अच्छा कोई दस्तावेज नहीं हो सकता है, सोवियत संघ भी टूट गया 😂 जबकि भारत का संविधान नित्य नूतन है, हर संविधान संशोधन के साथ परिष्कृत होता जाता है🙏 चीन थाईलैंड पाकिस्तान बर्मा आदि विभिन्न देशों के संविधान से उत्तम है, इसको तमाम विधिवेताओं ने स्वीकार किया है, अगर आप इसको एक जज की हैसियत से देखोगे तो आपको भी सुंदर लगेगा, क्योंकि उस समय इससे सुंदर कोई संविधान बनाया ही नहीं जा सकता था🙏


14. लोकतंत्र की यही खूबसूरती है, बहुमत की बात चले और अल्पमत का संरक्षण भी हो 🙏,आर्टिकल 25 से 30 तक को भी आपको पढ़ना चाहिए😂

15. संविधान सभा ने अति विश्वास के साथ यदि बाबा साहब के कंधों पर भार डाला, तो बाबा साहब ने भी अपने निहित स्वार्थ से दूर रहकर संविधान की रचना की उनका व्यक्तिगत विरोध संविधान में दिखाई नहीं देता है 🙏


16. इसीलिए भारत का हर विद्वान और विश्व का हर बुद्धिजीवी डॉ अंबेडकर को नमन करता है, व्यक्ति की आशंकाएं उचित है अथवा अनुचित है यह भविष्य का प्रश्न होता है🙏


17. मैं इससे पहले भी आपका एक लेख पढ़ चुका हूं जो आदिधर्म की पत्रिका में छपा था🙏 उसमें भी इंटरप्रिटेशन की बहुत सी त्रुटियां हैं, उसमें अपने ₹100000 देने का वादा किया है 🙏


18. अब आप ₹100000 मुझे दे ही दो ताकि हम आगे की चर्चा करें, कंसल्टेशन फीस तो बनती है ना 😂 मुझे अपने आर्थिक समानता के मिशन के लिए पैसे की जरूरत है, मैं सामाजिक समानता और राजनीतिक समानता के विषय पर काम नहीं कर रहा हूँ 🙏 वहा काम हमारे अन्य बुद्धिजीवी लोग कर रहे हैं 🙏


19. मैं केवल आर्थिक समानता पर काम कर रहा हूं, आर्थिक न्याय थोड़ा सा तकनीकी शब्द है! सामंतवाद को खत्म करने के लिए स्वीट प्वाइजन है, सामानता शब्द हार्ड प्वाइजन हो जाता इसलिए संसद में उसे स्वीकार नहीं किया गया था🙏


20. परंतु विगत 70 सालों में दलित समाज की प्रगति उस प्रकार दिखाई नहीं देती इस पर कार्य करने की अति आवश्यकता है! ऐसा इस वजह से हुआ क्योंकि आजादी के बाद हमारे समाज के लोगो ने सुप्रीम कोर्ट की वकालत आरंभ नहीं की है, हमारे समाज में संविधान को समझने और समझने वाले लोग ही नहीं रहे, मनुवादियों ने संविधान को जैसा समझाया हमारे समाज के लोग भी संविधान को वैसा ही समझते रहे 🙏इसलिए मैं आर्थिक समानता के आंदोलन को संचालित कर रहा हूं ताकि आर्थिक न्याय के रास्ते से आर्थिक समानता तक पहुंचा जा सके🙏


21. परसों आपसे बात करके अच्छा लगा, कोई तो युवा है जो बेगमपुर शहर की कल्पना करता है🙏 समाज के चिर परचित वृद्धजीवी श्री के.सी. रवि जी भी केवल दो ही जातियां मानते हैं एक अमीरी दूसरी गरीबी, मैंने उनका साथ किया था परंतु वह राजनीतिक व्यक्ति निकले, जबकि मुझे भ्रम हो गया था कि वह संत हो गाये हैं 😂 

22. मुझे अभी तक सामाजिक संघर्षशील सम्पन्न व्यक्ति नहीं मिला है इसलिए आर्थिक समानता का मूवमेंट मंद गति से चल रहा है 🙏 भगवान बुद्ध ने कहा है, मार्ग में अपने जैसा साथी ना पाए तो अकेले ही चले, मैं अपने मार्ग पर अकेला चल रहा हूं🙏


अगर आप साथ देना चाहे तो अच्छा होगा🙏


जिसे आप बेगमपुर शहर कहते हैं 🙏


 मैं उसे रविदास राज कहता हूं 🙏


23. रविदास राज की बात हो या बेगमपुर शहर उसके लिए राजपथ भारत का संविधान ही है, ऐसा सुंदर राजपथ तो संत शिरोमणि गुरु रविदास जी के समय में भी नहीं था🙏 संविधान का प्रमबिल और डायरेक्टिव प्रिंसिपल ऑफ़ स्टेट तो स्टेट के गले में बंधी घंटी के समान हैं 😂 दलित (विद्वान) अधिवक्ताओं को समय-समय पर इसे बजाते रहना चाहिए 🙏


चलते-चलते मेरा सुझाव है कि आपको मिनर्वा मिल केस 1980 और 1973 का केशव नंद भारती केस भी पढ़ना चाहिए, इससे आपको संविधान को समझने में काफी मदद मिलेगी❤️


अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा @9335122064

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