मित्र ऋषि पाल जी,
🙏 आप हमारे पुराने मित्र हैं इसलिए आपको सामान्य जानकारी दे देता हूं,
1. सेना में करनाल के नाम के आगे करनाल और कप्तान के नाम के आगे कैप्टन लगाना आवश्यक होता है अगर कोई नहीं लगता है तो संबंधित व्यक्ति उसे पर मानहानि का मुकदमा चल सकता है🙏
2. इसी प्रकार सचिवालय के अंदर माननीय सांसदों और विधायकों के आगे माननीय शब्द लगाना आवश्यक है, कोई सरकारी कर्मचारी ऐसा नहीं करता है तो उसे अनुशासनहीनता माना जाता है और ऐसा कर्मचारी सेवा से निकाला जा सकता है 🙏
3. इसी प्रकार बार काउंसिल आफ इंडिया में पंजीकरण के बाद लॅ ग्रेजुएट एडवोकेट हो जाता है🙏 वह अपने नाम में अधिवक्ता लिख सकता है 🙏
4. माननीय न्यायालय के जज को हर ऑर्डर सीट पर विद्वान अधिवक्ता लिखना पड़ता है, यह ब्रिटिश न्यायलय की परंपरा है जिसका आज तक अनुपालन किया जाता है🙏
5. जो व्यक्ति अधिवक्ता नहीं है खुद को अधिवक्ता लिखता है, तो उसे पर भारतीय दंड संहिता धारा 420 के अंतर्गत मुकदमा चलाया जा सकता है 🙏
अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा
मो. 9335122064👏
मान्यवर, 🌹🙏
(लेख दिनांक 1 जुलाई 2024 )
मेरे इस लेख के प्रेरक मित्र ऋषि पाल जी हैं, अभी उनसे बहुत लंबी चर्चा हुई, उसके बाद इस लेख को लिखने का विचार आया🙏
जब रविदासिया धर्म नहीं था
तब आदधर्म हुआ करता था
( पुनः स्पष्ट कर दूँ मेरी उम्र 4 साल है, यदि लेख को परिशुद्ध करने की आवश्यकता हो तो बुद्धिजीवी मुझे सूचित कर सकते हैं l)
1. सन 1925 से पहले आदधर्म नाम का कोई भी ज्ञात धर्म नहीं था, आदधर्म एक कंप्लीमेंट है, पूरक धर्म है l
2. ब्राह्मणों की पुस्तकों में, जैसे वेद, पुराण, ब्राह्मण ग्रंथ, उपनिषद और महाकाव्य में जिनका शोषण किया गया, जो गैर शासक लोग थे, सन 1960 में पूरे किए गए आदधर्म Batch में उनको इतिहास के रूप में संकलित कर लिया गया🙏
3. सन 1960 से पहले आदधर्म का कोई पृथक ग्रंथ नहीं था, ब्राह्मणों धर्म के प्रतिवादी संतो को आदधर्म का संत/ ऋषि माना गया है जैसे वाल्मीकि, संबुक ऋषि, चेतता चमार आदि लगभग डेढ़ सौ संत और महापुरुषों बताए जाते हैं, और यह ग्रंथ 1400 पेज का हैंl
4. इस ग्रंथ के रचयिता संत ईश्वर दास जी बताए जाते हैं🙏 जिन्होंने क्रांतिकारी बाबू मांगू राम जी के अनुरोध पर ग्रंथ लिखने का काम किया था🙏 और आदधर्म को पृथक धर्म के रूप में मान्यता का प्रयास किया था🙏
5. क्योंकि यह ग्रंथ ब्राह्मण धर्म के ग्रंथो से निकाल कर आया है, और प्रतिवादी समाज की दशा को व्यक्त करता है, इसलिए आदसमाज उतना ही पुराना है जितना ब्राह्मण धर्म का समाज🙏
6. 100 वर्ष पुराना डेरा बाला की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही है, पूरे समाज को चरित्रवान बनाए रखने के लिए एक डिसीप्लिनरी कमेटी का गठन किया गया, जो खुरलगढ़ से संचालित होती थी 🙏
7. कालांतर में संत समाज और उसकी डिसीप्लिनरी कमेटी के बीच विवाद उत्पन्न हुआ जिस कारण रविदासिया धर्म का जन्म हुआ 🙏
8. ऐसा कहां जाता है कि आदधर्म में 36 शोषित जातियां हैं 🙏 जिनका आपस में रोटी बेटी का संबंध रहता है और खुद को आदधर्मी लिखना बाध्यकारी है l
9. जब आदधर्मग्रंथ नहीं था तब आदधर्म ग्रंथ के मध्यकालीन भारतीय संतों की वाणी गुरु गोविन्द साहब द्वारा संकलित गुरु ग्रंथ साहब में कर ली गई थी🙏
10. इस प्रकार सिख धर्म का गुरु ग्रंथ साहब वह आधार ग्रंथ है, जो आदधर्म के आधार को मजबूत करता हैl
11. गुरु अर्जुन देव के बाद मुस्लिम संप्रदाय के साथ धार्मिक और शासकीय अलगाव उत्पन्न हुआ, उसमें शक्ति के रूप में आद धर्मियों को सैनिक के रूप में प्रयोग किया गया, परन्तु उनकी वीर गाथाओं को भुला दिया गया🙏
12. अंग्रेजी शासन काल आते-आते गुरु गोविंद सिंह द्वारा गुरुग्रंथ साहिब स्थापित किया गया था, जिसमें संत रविदास की वाणी प्रमुख थी ऐसा चाहू राज मैं......
13. गुरुद्वारों के गद्दीनशीन धर्म गुरुओं ने इसमें मनमाने परिवर्तन कर दिये 🙏 और संत रविदास की वाणी को केवल गुरुद्वारा तक सीमित कर दिया संपूर्ण समाज में उसको फैलने नहीं दिया 🙏
14. इस प्रकार सिख धर्म दो भागों में टूट गया, आदधर्म और सिखधर्म 🙏
15. रविदास समाज का मध्यकालीन युग में काफी प्रभाव रहा है सुना है 152 राजा संत रविदास के शिष्य थे l उसी का लाभ उठाकर रविदासिया धर्म की स्थापना कर दी गई 🙏
16. क्योंकि बाबा साहब डा अंबेडकर के समकालीन समाज के सुसिश्चित लोगो ने संत ईश्वर दास द्वारा लिखे गए आदधर्म ग्रंथ से असहमत थे , उसका मानना है कि संत ईश्वर दास ने ब्राह्मण धर्म की कल्पित कथाओं को भी इतिहास बना दिया है l
17. प्रबुद्ध आदधर्मी भी मानते हैं, आदधर्म ग्रंथ की 17 टीकायें है, जो विभिन्न प्रकार की व्याख्या करती हैं 🙏
18. इस प्रकार रविदास समाज और आदधर्म समाज के संतों का अपना-अपना ढपली और अपना-अपना राग है 🙏
19. कुछ चोलाधारी संत भी है यदि उनको छोड़ भी दिया जाए, तो भी प्रबुद्ध संतों के बीच काफी विवाद है l
इसमें सबसे बड़ा विवाद संज्ञा का विवाद है 🙏
दूसरा सबसे बड़ा विवाद जातियों के संगठन का है क्योंकि रविदासिया समाज से केवल एक जाति का बोध होता है 🙏
जबकि शोषण तो सभी 36 जातियों का हुआ है, आज भी हो रहा है🙏
20. मैंने भ्रमण के दौरान इस वेदना को भी सुना है कि रविदास समाज से इतर अन्य समाज के लोगों ने तुगलकाबाद रविदास मंदिर में भाग लिया, उन लोगों के घर वालों ने यह कहकर बहिष्कार कर दिया कि रविदास मंदिर के लिए आपको जाने की क्या आवश्यकता थी l
21. ऐसी दशा में मैं संत प्रमुख का चुनाव आवश्यक समझता हूं, अगर संतों के ऊपर भी एक डिसीप्लिनरी कमिटी हो, ताकि दूषित मानसिकता के असंत(दुसन्त) समाज में कुव्यवस्था ना फैलाएं 🙏
22. जिस प्रकार बौद्ध समाज में चीवर उतार लेने का रिवाज है, अगर सिख समाज में, आदधर्म समाज में, रविदासिया समाज में, भी हो जाए तो इसमें बुराई क्या हैं l
मेरी बात का विरोध वही करेंगे जो दुसंत है 🙏
सभी की मंगल कामनाओं के साथ आपका शुभचिंतक 🌹
अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा
मो. 9335122064👏
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