🌹अति आवश्यक सूचना दिनांक 20 जुलाई 2024
आज एक सामान्य चर्चा के बाद महसूस हुआ कि अपने समाज के लोगों को न्यायालयों की विधिक स्थिति को समझा दिया जाये 🙏
क्योंकि पढ़े लिखे लोग भी इसे समझने में भयंकर भूल करते हैं🙏
भारत में न्यायालय दो प्रकार के हैं,
पूर्ण न्यायालय और
अर्ध न्यायालय -
पूर्ण न्यायालय :- इसके अंतर्गत लोअर कोर्ट, हाई कोर्ट और माननीय सर्वोच्च न्यायालय आता है 🙏
लोअर कोर्ट दो भागों में विभक्त है,
सिविल न्यायालय और आपराधिक न्यायालय,
हाई कोर्ट और माननीय सर्वोच्च न्यायालय में कोई विभाजन नहीं है 🌹
अर्ध न्यायालय :-
सभी आयोग जो सीधा जनता से जुड़े हैं, अर्ध न्यायालय की श्रेणी में आते हैं🙏
सभी मान्यता प्राप्त रिडर्सल संस्थाएं जो जन सुनवाई करती हैं, और शीघ्रता से विवादों को निपटाने का प्रयास करती हैं🙏 अर्ध न्यायालय की श्रेणी में आते हैंl
ट्रिब्यूनल - इनको विशेष न्यायालय भी कहा जाता है🙏 यह तकनीकी विषय पर अपना फैसला सुनाती हैं, और लोअर कोर्ट के समान शक्ति रखती है l
न्यायालय के कर्तव्य :-
सभी लोअर कोर्ट विधि के अनुसार अपना फैसला देते हैं🙏 और परंपरागत स्थापित विधि प्रक्रिया का पालन करते हैं🙏
हाई कोर्ट:-
हाई कोर्ट इस बात की निगरानी करता है कि लोअर कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला विधि के अनुसार है अथवा नहीं, कुछ मामला में मूल अधिकारों पर भी विचार करता है 🙏
सर्वोच्च न्यायालय:-
सर्वोच्च न्यायालय इस बात की जांच करता है, दिया गया फैसला अथवा कानून संविधान का उल्लंघन तो नहीं करता है 🙏
सभी पूर्ण न्यायालय को परंपरागत स्थापित विधिक प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है
जबकि अर्ध न्यायालय :- सिविल शक्तियों के साथ अपनी घोषित प्रक्रिया पर काम कर सकते हैं 🙏
उपरोक्त लेख लिखने का मात्र एक ही कारण है:-
माननीय सर्वोच्च न्यायालय में हमारे समाज के अधिवक्ता नहीं है-
इसलिए हमारे समाज को मिलने वाला लाभ संविधान सम्मत है अथवा नहीं है इसकी जांच करने के लिए ना तो कोई जज तैयार होता है और ना ही अधिवक्ता उसकी उसे तरह से परवी करते हैं जैसे हमारे समाज का अधिवक्ता करेगा🙏
हमारे समाज के लोग माननीय सर्वोच्च न्यायालय में केस नहीं करते इसलिए सर्वोच्च न्यायालय में हमारे समाज के अधिवक्ता भी नहीं पाए जाते हैं 🙏
इसलिए आजादी के 70 साल बाद भी हमारे समाज को संविधान सम्मत न्याय नहीं मिला है🙏
मैं मा. सर्वोच्च न्यायालय में अपने समाज के अधिवक्ताओं के आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहा हूं🙏AOR की परीक्षा में कोई आरक्षण नहीं होता, अधिकांश हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज AOR में से बनते हैं l
इसके साथ-साथ विधिक सेवा प्राधिकरण में भी हमारे समाज के अधिवक्ताओं का कोई आरक्षण नहीं है मैं उसके लिए भी संघर्ष कर रहा हूं 🙏 गरीवो के जनहित के मुद्दे विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा संज्ञान नहीं लिया जाता, क्योंकि वहां पर हमारे समाज का कोई अधिवक्ता नहीं होता है, उनके पैनल में केवल सवर्ण अधिवक्ता होते हैं, अथवा गूंगे अधिवक्ता होते हैं🙏
मुझे उपरोक्त दोनों विषय पर अपने समाज का कोई भी अधिवक्ता संघर्ष करते हुए दिखाई नहीं देता है अगर किसी की संज्ञान में हो तो कृपया मुझे सूचित करने का कष्ट करें🙏
सामाजिक चिंतक:- अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा 👏
मो. 9335122064
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