Wednesday, 24 July 2024

संसार में केवल दो ही धर्म है : एक समतावादी धर्म है दूसरा विषमतावादी धर्म हैl (April 08, 2024)

 फाइल स्टोरी 8 अप्रैल 2024 

 (पुनः प्रकाशित दिनांक 18 जुलाई 2024 )


बड़ी अद्वितीय जानकारी है, बुलाकी सर जी  l


अगर ऐसा है तो इसी कमेटी को केंद्रीय कमेटी कहा( समझ जाना )  जाना चाहिए, फिर अलग से केंद्रीय कमेटी बनाने की क्या आवश्यकता थी?


 राजनीतिक आंदोलन

 और धार्मिक आंदोलन को अलग-अलग रूप में देखा जाना चाहिए, राजनीतिक आंदोलन धर्म नहीं होते l


 इस संदर्भ में एक दृष्टांत मुझे याद आता है, हमारे समाज के एक बड़े अधिकारी थे जिन्होंने एक समिति का गठन कर लिया, और समिति के नाम में ट्रस्ट शब्द जोड़ दिया, मैं भी उनकी समिति को टेस्ट समझता था l जब उनका पंजीकरण सर्टिफिकेट मैंने देखा, तब मैंने उनको बताया कि आपकी सोसाइटी है ट्रस्ट नहीं है, परंतु वह मुझसे बहस करने लगे कि उनका ट्रस्ट है l


 एक अधिवक्ता होने के कारण मेरे पास बहुत सी सोसाइटियों और ट्रस्ट के बायोलॉजी है l फिर मैंने उनको दिखाया और दोनों का अंतर समझाए, वह बड़े अधिकारी थे बड़ी मुश्किल से हमारी बात को स्वीकार कर सकेl


 मैं एक कटु सत्य कहने जा रहा हूं, जो जड़े दिला देगा l राजनीतिक आंदोलन को धर्म समझने की भूल न करें भले ही उसमें धर्म शब्द लगा हो l


 जहां तक मान्यता की बात है, भारतीय जनता पार्टी की सरकार हो या कांग्रेस की सरकार या सवर्ण बिरादरी के छद्म अधिकारी, वह तो सदैव से चाहते रहे हैं कि दलित समाज टुकड़े-टुकड़े हो जाए इसीलिए उन्होंने तमाम जातियां का निर्माण किया यही उनकी फूट डालो और राज करो नीति का अंग है l 


 यदि किसी प्रवर्तक को हथियार उठाना पड़ता है तब वह धार्मिक आंदोलन नहीं है, वह भगवान नहीं हो सकता है l 


 धरती पर कुछ ही धर्म हुए हैं, उन में विकृतियां आ गई तो सुधारवादी पैदा हुए, धार्मिक सुधारवादी द्वारा उत्पन्न व्यवस्था नया धर्म नहीं है l


 संसार में केवल दो ही धर्म है,


 एक समतावादी धर्म है दूसरा विषमतावादी धर्म हैl


 धर्म का उद्देश्य मनुष्य को कार्यशील बनाना होता है, संगठित करना होता है विवेकशील बनाना होता है, ताकि हम अन्य प्राणियों से कुछ उन्नतशील दिखे l


 धर्म चाहे समतावादी हो या विषमतावादी दोनों में ही मनुष्य को कार्यशील विवेकशील और उन्नत उन्मुख बनाने का कार्य करता है इस कारण मनुष्य जाति अन्य प्राणियों से उन्नतशील दिखती हैl


आपस में लड़ते रहना पशुता है, कोई संत इस पशुता से मुक्त करके मनुष्यता की तरफ ले जाता हैl


 कृपया संविधान का आर्टिकल 25 पढ़ें और देखें समतावादी धर्म कौन-कौन से हैं, विषमतावादी धर्म के नाम तक का उल्लेख नहीं किया गया है भारतीय संविधान मेंl 🙏


 परंतु अफसोस की बात विषमतावादियों ने संविधान का अतिक्रमण कर लिया और समतावादी आपस में लड़ते ही रह गये l समतावादी धर्म का एक संघ है जिसे हिंदू कहते हैं इसमें सम्मिलित है, बौद्ध जैन और सिख l


पुनः स्पष्ट कर दूं कोई भी राजनीतिक आंदोलन अपने नाम में धर्म लगाकर धर्म नहीं हो जाता हैl भले ही वह समाज के लिए कितना भी कल्याणकारी क्यों ना रहा हो l 


मेरे इस लेख का उद्देश्य इतिहास की किसी भी घटना को कम कर देखना नही हैl घाट घाट का पानी पीने के बाद, मेरा यह कर्तव्य है कि मैं अपने समाज को सत्य से रूबरू कराऊं  🙏 जो तोड़े और लड़ाये वह धर्म नहीं है संत नही है 🙏l


 अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा👏

मो. 9335122064

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