🌹संवेदना लेख 🙏 दिनांक 22 अगस्त 2024
क्या भारत बंद के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग दोषी है🇮🇳
यह पर वह संक्षिप्त कारण है जिसकी वजह से कल भारत बंद था🙏
कल माननीय सुप्रीम कोर्ट के लाइब्रेरी में था, और वहां से उन साक्ष्यों को निकाला है 🙏 अध्ययन किया है, जो भारत बंद के लिए उत्तरदाई थे 🙏
पूरा आदेश तो 565 पान्ने का है,
आदेश के मुख्य बिंदु मैंने निकाल कर आपको दे दिया हैं आप उसको पढ़ सकते हैं🙏
पूरे आदेश को प्रिंट कराता तो ₹1100 लगते इसलिए केवल 6 पेज ही प्रिंट कराया है जबकि पूरा आदेश हमारे समाज के पास होना चाहिए, हर बार आप के लिए ऑनलाइन पढ़ाना सरल नही होता, न जाने कब उसको ऑनलाइन से हटा दिया जाए, इसलिए प्रिंट अपने पास होना चाहिए🙏 मुझे अपने आय-व्यय संतुलन रखना पड़ता है, क्योंकि सामाजिक कार्य के लिए समाज से संगठनात्मक रूप से अभी मुझे कोई धन प्राप्त नहीं होता है 🙏
हमें अपने समाज की सुरक्षा के लिए, ऐतिहासिक साक्ष्यों की लाइब्रेरी बनानी चाहिए, इस संदर्भ में एक घटना याद आता है आज उसको आपके साथ शेयर कर दूं 🙏
जब मैं इलाहाबाद में था, तब इंजीनियरिंग कॉलेज का टीचर होता था🙏 और जब सामाजिक विषय में उलझा, तो इंजीनियरिंग कॉलेज की पुस्तकों के अतिरिक्त सामाजिक विषयों पर भी पुस्तके खरीदी🙏 मुझे पुस्तकों से अत्यधिक मोह हो गया था 🙏
मेरा पांच लोगों का परिवार हुआ करता था, जो मेरे साथ रहा करता था, समय के साथ सब बिखरता चला गया, समाज को जानने और समझने की मेरी भूख शांत नहीं हुई 🙏इसी अनुक्रम में अगस्त 2011 में मैं पतंजलि योगपीठ की तरफ आ गया 🙏
पांच लोगों की गृहस्ती का सामान मैंने वहां पर वैसे ही छोड़ दिया, केवल 4 कुंतल पुस्तके लेकर पतंजलि योगपीठ आ गया🙏
इसमें हमारा PC और प्रिंटर भी सम्मिलित था, जब पतंजलि योगपीठ पहुंचा, तो पतंजलि संगठन की दर्जनों पुस्तक पढ़ने का मौका मिला🙏और जब विधिक कार्यों के लिए दिल्ली आया, तो अन्य पुस्तकों को भी पढ़ने का मौका मिला क्योंकि दिल्ली के पुस्तक मेले में आने अवसर मिला 🙏
पुस्तके खरीदने के मामले में मुझे पतंजलि योगपीठ में कभी कोई दिक्कत नहीं हुई, जो पुस्तक खरीदता उसका बिल लगा देता, और सेवावृत्ति विभाग द्वारा उसका पेमेंट कर दिया जाता, इस प्रकार दिन प्रतिदिन पुस्तकों की संख्या और बढ़ती गई 🙏 परंतु पढ़ने की मेरी प्यास शांत नहीं हुई 🙏 जितना भी पढ़ता जाता था अधूरा ही लगता था 🙏 क्योंकि जूठन खाकर किसका पेट भरा है😂 दुनिया की समस्त पुस्तके एक मात्र जूठन है 👏
सितंबर 2013 में कुछ ऐसा संयोग बना कि मैं विपासना मेडिटेशन सेंटर में चला गया🙏 और 10 दिन की विपस्सना करने के बाद लौट 🙏 तो अध्यात्म जगत की समस्त पुस्तके बौनी साबित हूंई 🙏
समाजशास्त्र पर लिखी गई समस्त पुस्तके, कचरे के डब्बे में फेंकने योग्य लगी 🙏
क्योंकि पुस्तकों के माध्यम से संसार जिस तरह का दिखता है वास्तव में संसार वैसा नहीं है🙏
इस आध्यात्मिक क्रांति के बाद मुझे इसकी गहराइयों में जाने की और आवश्यकता महसूस हुई 🙏 क्रमिक प्रक्रिया पर चलते हुए 5 वर्ष मैंने गहन साधना में बिताये, और पुस्तकों से दूर होता चला गया🙏
सन 2018 में जब वापस दिल्ली आया, और एक लॉ फॉर्म का मैनेजर हुआ, तब विधि का पूरा ज्ञान मेरे दिमाग से निकल चुका था, पूरी तरह से एक ख्याली दुनिया थी, परंतु न्यायपालिका ख्याली दुनिया पर नहीं चलती है, उसको साक्ष्य की आवश्यकता होती है 🙏
इस प्रकार एक बार फिर से मुझे पुस्तकों को पढ़ने के लिए खुद को तैयार करना पड़ा 🙏 मेरी लगभग सभी पुस्तक पतंजलि योगपीठ में खो गई थी 🙏 विधि की पुस्तक भी मेरे पास नहीं थी 🙏
माननीय सर्वोच्च न्यायालय की AOR की परीक्षा के लिए मुझे नए सिरे से पुस्तकों को एकत्र करना पड़ा 🙏
सन 2022 में, मैं जब श्री मंगतराम वाली जी से उनके घर / दुकान पर मिला तो काफी निराश हुआ, क्योंकि 2019 में जब आर.के. पुरम के श्री रविदास मंदिर में उनसे मुलाकात हुई तब उन्होंने खुद को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का एक बड़ा अधिकारी होने के बारे में बताया था🙏 मुझे भी लगा कि वह समाज के लिए कुछ अच्छा काम कर रहे होंगे🙏
परंतु उनके घर पर पहुंच कर लगा यह तो भटके हुए आदमी है, इन्हें विधि के क्षेत्र में अपने समाज को आगे बढ़ना चाहिए था, परन्तु यह खेलकूद के सामान की दुकान खोल कर बैठे हैं🙏
इससे एक बात तो साफ हो गई थी कि उनके लिए पैसा प्रमुख है, समाज को सुसंगठित करना और ज्ञान बाँटना उनका उद्देश्य नहीं है 🙏
मैंने उनसे निवेदन भी किया था एक ऐसी लाइब्रेरी स्थापित कीजिए जिसमें समाज के लोगो का कल्याण हो 🙏 समाज के लिए विधि का कार्य कीजिए क्योंकि आप बड़े अधिकारी रहे हैं 🙏
परंतु ऐसा कुछ होता हुआ मुझे दिखाई नहीं दिया, मैं मंगोलपुरी के उस मंदिर में भी गया, जहां के वह पदाधिकारी है, वहां लाइब्रेरी तो है परंतु खुलती नहीं है 🙏 मुझे खुली हुई नहीं मिली 🌹 इस प्रकार मैं नहीं देख सका वहां की लाइब्रेरी में क्या है🙏
हमारे समाज के पढ़े लिखे लोग समाज को सुशिक्षित और संगठित नहीं करेंगे तो, चोरी होने से पहले हमें कोई सूचना नहीं मिलेगी, जब समाज का सब कुछ लुट-पिट जायेगा, तब भारत बंद करते रहिए, संपन्न जातियां भारत बंद करते हुए क्यों नहीं दिखाई देती?
क्योंकि समय पूर्व उनके पास सूचना पहुंच जाती है, और हर मामले में न्यायपालिका में उस पर रोक लगवा लेते हैं 🙏
परंतु हमारे समाज के लोग आपस में ही मुंह बजाने में तेज होते हैं, अधिकारी के सामने जाने से डरते हैं, न्यायाधीश के सामने जाने से डरते हैं🙏 वकील को फीस देना भी नहीं चाहते, अपने समाज का सामाजिक वकील बनना भी नहीं चाहते, क्योंकि वह बिना डिग्री के ही खुद को बहुत बड़ा वकील मानते हैं 🙏
इस प्रकार हम कह सकते हैं वह बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर द्वारा बनाई गई व्यवस्था को नहीं मानते हैं और अपने ढंग से व्यवस्था चलाते हैं🙏 सभी दलित पार्टियों और संगठनों की अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग है 🙏
इसलिए भारत का संविधान विगत 74 सालों में केवल अनुसूचित जाति के लोगों को हक और अधिकार दिलाने के लिए 105 बार घायल किया गया है 🙏 किसी संपन्न जातियों के लिए तो मात्र एक दो बार हुआ होगा🙏
यदि माननीय सर्वोच्च न्यायालय में हमारे समाज के अधिवक्ता होते तो संविधान इतनी बार घायल न किया गया होता 🙏 समाज के अधिवक्ता माननीय सर्वोच्च न्यायालय में होंगे तब न्याय मिलेगा, कोई भी जज बिना पिटीशन बिना एविडेंस के कुछ नहीं कर सकता है, पिटीशन और एविडेंस लाना अधिवक्ता का काम है जज का काम नहीं है 🙏
परंतु संविधान विरोधी लोग जुडिशल कमिशन पर ज्यादा जोर दे रहे हैं, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खत्म कर देना चाहते हैं 🙏 न्यायपालिका जब स्वतंत्र होगा तब आम जनता और भारत के नागरिकों की रक्षा न्यायपालिका में कर पाएगी 🙏
मेरी जानकारी में ऐसा आया है कि जुडिशल कमिशन बनाने की सलाह राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने भारत सरकार को दी, उस वार्षिक रिपोर्ट की ड्राफ्टिंग श्री मंगतराम वाली जी ने की थी, कांग्रेस ने उनकी सलाह को नहीं माना, परंतु शातिर बुद्धि की मोदी सरकार को यह समझ में आ गया, कि अंतिम बची स्वतंत्र संस्थान न्यायपालिका को कैसे गुलाम बनाया जा सकता है 🙏
भारतीय संविधान के विरोधी तो सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति के लोग ही है वह भारतीय संविधान की रक्षा करने में विफल रहे हैं, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अनुसूचित जाति की प्रगति के आंकड़े नहीं जुटाता है, जोकि उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है,🙏
सन 2015 में मेरे द्वारा लगाई गई आरटीआई का जबाव आज तक उसने नहीं दिया है, जिसमें अनुसूचित जाति की प्रगति के आंकड़े मैंने मांगे थे, मिडिया समाचारों में जो प्रगति दिखाई दे जाती है वह उनके अपने आंकड़े हैं, अपने राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए है कोई भी सरकारी संस्था का आंकड़े नहीं है 🙏
यदि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने सरकार को अनुसूचित जाति की जातिवार प्रगति के आंकड़े उपलब्ध कराए होते तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय का 1 अगस्त 2024 का आदेश इस प्रकार ना आता, और भारत बंद करने की जरूरत ना पड़ती 🙏भारत बंद के लिए मात्र एक ही दोषी संस्था है वह भारत का राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग है 🌹🙏
उपरोक्त सभी बिंदुओं पर हमको नए सिरे विचार करना पड़ेगा🙏
सामाजिक चिंतक अधिवक्ता कमलेश कुमार मित्रा 👏9335122064
No comments:
Post a Comment