🌹आध्यात्मिक चर्चा सूचना दिनांक 22 नवंबर 2024
सुबह के 5:30 बजने वाले हैं, आज के विशुद्ध ध्यान में मन स्थिर नहीं हो सका है 🙏
भटकता ही रहा है
ध्यान कई प्रकार का होता है, मैं विशुद्ध ध्यान की बात कर रहा हूं🙏
1. विशुद्ध ध्यान में ना तो किसी नाम का सहारा लिया जाता है और ना ही किसी चित्र का, विशुद्ध सांसों के आगा-गमन पर नथुनों के पास मन को टिकाया रखना पड़ता है, और लंबे समय तक सांसों के आने-जाने की प्रक्रिया को देखते रहना पड़ता है, इसी को पिछली चर्चा में मैंने कहा था कि कम से कम उम्र के अनुपात में अर्थात 30 साल उम्र है तो कम से कम 30 मिनट, 40 साल उम्र है तो कम से कम 40 मिनट का ध्यान करना लाभदायक होता है ( प्रतिदिन सुबह-शाम)🙏
2. जो लोग विशुद्ध सांस के सहारे ध्यान नहीं लगा सकते, वह नाम का सहारा लेते हैं, चित्र का सहारा लेते हैं, चित्र स्मृति का सहारा लेते हैं🙏
3. नाम कोई भी हो सकता है और किसी के गुरु के द्वारा लिया जा सकता है या स्वयं से भी कर सकते हैं, परंतु सभी धोखे हैं 🙏 जिनका इतना करने पर भी नहीं टिकता, वह माला का सहारा भी ले लेते हैं 🙏अब वे एक साथ तीन जगह पर मन टिकाने की कोशिश करते हैं🙏 मन को तीन स्थानों तक ही सीमित रखते हैं -> सांसों के साथ, शब्द के साथ, और माला की गुरिया के साथ🙏
4. जिनका इतने पर भी ध्यान नहीं टिकता, वह रूप ध्यान करते हैं, किसी आराध्य के रूप को आंख बंद करके याद करते हैं परंतु यह सब भी धोखे है 😂
5. आचार्य बालकृष्ण ने आयुर्वेद में जड़ी बूटियां का अध्ययन कराते समय एक बात कही थी, जब भी हम जड़ी बूटियां को टैबलेट या कैप्सूल के फॉर्म में बनाते हैं, उस बूटी की 40% शक्ति समाप्त हो जाती है😂 परंतु फिर भी उनका दिव्या फार्मेसी ट्रस्ट दवाइयां का निर्माण करता है 🙏 क्योंकि लोगों को रेडीमेड चाहिए😂
6. विशुद्ध सांसों पर मन को टिकाना अत्यंत कठिन काम है, पिछली बार चर्चा में मैंने कहा था, जो विपश्यना के साधक हैं वह भी इस चूक को करते हैं 🙏 उनका मन विशुद्ध सांसों पर टिका नहीं रहता, वह आर्त ध्यान अथवा रौद्र ध्यान करने लगते हैं🙏
7. इसके परिणाम स्वरुप विकार बढ़ जाते हैं, कई बार तो विकार इतने बढ़ जाते हैं, कि उनके लिए अपने शत्रु पर हावी रहना अत्यंत सहज हो जाता है अथवा मानसिक विक्षिप्त हो जाते हैं 🙏 अथवा जीवन में इतनी निरस्ता आ जाती है कि वह गृहस्त जीवन का परित्याग कर देते हैं 😂 यह दोनों ही अतियां बुरी है 🙏
8. इसीलिए संत कबीर संत रविदास, दादू, नानक आदि ने साहज ध्यान की परंपरा को अपनाया है, ताकि घर गृहस्ती से विमुक्ति ना हों, और शत्रुओं पर आक्रमण पशुता के स्तर तक ना बढ़ जाए 🙏
9. क्योंकि ध्यान का असर चित्त पर होता है, जिससे भय संस्कार निकल जाता है, और मनुष्य बंदर के समान व्यवहार करता है, अथवा शेर के समान🙏अन्य विकारों पर भी असर करता है, उसके परिणाम अलग-अलग होते हैं🙏
10. ध्यान का लाभ सबसे अधिक एकाग्रता में मिलता है, व्यक्ति विक्षिप्तता पूर्ण व्यवहार नहीं करता हैं, एक समय में एक ही काम पर मन एकाग्र रहता है इसलिए अधिकारी, कर्मचारी, नेता विद्यार्थी आदि उस एक विषय को अधिक गहराई से समझ पाता है🙏
11. जितने भी वैज्ञानिक और शोधक होते हैं, उनके मन की एकाग्रता उच्च कोटि की होती है, यह एकाग्रता उनको पारिवारिक संस्कारों से प्राप्त हो जाती है, अथवा किसी गुरु के सानिध्य से, इसलिए उच्च जातियों की स्मृति अच्छी होती है, उनका मन किसी विषय पर आसानी से एकाग्र हो जाता है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष या परोक्ष धन पद्धति से जुड़े हुए होते हैं🙏
12. यह दूसरा विषय है कि उच्च जातियां समाज की अन्य जातियों का शोषण करने के लिए अपनी योग्यता का अधिक प्रयोग करती है क्योंकि वह विशुद्ध ध्यान नहीं करते हैं 🙏
13. वैज्ञानिक शोध में अग्रणी देशो का राज धर्म बौद्ध है, बौद्ध धर्म विशुद्ध ध्यान पर जोर देता है, जैसे चीन ताइवान जापान आदि 🙏 अन्य ध्यान की पद्धतियां व्यापारिक संस्कृति को बढ़ावा देती है 🙏
14. रूप ध्यान, मंत्र ध्यान, यज्ञ, पूजा भजन आदि 🙏-> चाहे ईसाई धर्म के यीशु को ले ले देवी रूप ध्यान है, इस्लाम के मोहम्मद साहब को लेने, वह स्मृति ध्यान है 🙏
15. परंतु विशुद्ध ध्यान, सांस से शरीर तक जाता है, चित्त और शरीर को स्वस्थ करता है मनुष्य को मनुष्य बनता है🌹
16. जब कोई मनुष्य मनुष्य हो जाता है, तो उसमें भय संस्कार निकल जाते है, वह कबीर हो जाता है और बेबाक बोलता है, रविदास हो जाता है सीधे चुनौती देता है दादू, सहजो जो तमाम नाम जुड़े हुए हैं, जो मानवता के संदेश के प्रचारक रहे, जिनकी अपनी बोधी थी, बुद्धि तो पंडित के पास भी होती है 🙏
कांकर पाथर जोड़ी के मस्जिद लई बनाए.......
दुनिया इतनी बाबरी पत्थर पूजन जाए........
सीधे चुनौती देना इस बात को दर्शाता है कि भय का संस्कार नहीं है....... उसको कोई भयभीत नहीं कर सकता है......
ऐसा व्यक्ति मनुष्य के लिए कल्याणकारी राज्य की स्थापना का मार्गदर्शन दे सकता है, ऐसा चाहूं राज मैं.....
नानक की परंपरा थोड़ी सी अलग है रूप ध्यान जैसी ही है...
एक तू ही निरंकार......
17. बांकी ग्रंथो की मोटी-मोटी किताबें बकवास हैं, उनके लिए जिन्होंने जान लिया है 🌹
जिसने चाय पीकर देख ली उसको कोई चाय का ज्ञान क्या देगा कि चाय मीठी होती है😂
जिसने चाय नहीं पी, उसको चाय का ज्ञान देते रहिए कि चाय मीठी होती है उसमें इलायची का स्वाद होता है, उसको पी-कर ताजगी आती है आदि बाते.....
जिसकी बोधि जागृति हो गई उसके लिए अमृतवाणी हो, श्री गुरु ग्रंथ साहिब हो, आदि प्रगाश ग्रंथ हो, तिपिटक हो, उपनिषद हों या वेद हों आदि आध्यात्मिक ग्रंथ सब कबाड़ स्टोर की पुस्तके हैं 🌹
18. चलते चलते बनारसी दास जी का उल्लेख करना चाहूंगा......
अभी जल्दी ही उनसे मुलाकात हुई थी, उन्होंने संत शिरोमणि गुरु रविदास की ध्यान पद्धति के बारे में मुझसे चर्चा की थी,
सो-हम 🙏
एक मंत्र ध्यान है, बैसाखी(ढकेला ) है, आरंभ में अच्छी है,
इसीलिए संत शिरोमणि ने गुरु रविदास ने, अपनी ध्यान पद्धति में बैसाखी को बदलते रहे हैं ताकि किसी को बैसाखी से मोह ना हो जाए 🙏 इसलिए कहीं पर उन्होंने हरि हरि कहा है, कहीं सो-हम सो-हम कहा है, कही राम-राम कहा है, और कही मुकंद मुकंद कह दिया है 😂
ताकि उनके भक्त लोग बैसाखी से चिपके नहीं, किसी भी नाम का सहारा लेकर सांसों पर टिका रहा जा सकता है🙏
परंतु अंतिम लक्ष्य विशुद्ध सांस पर टिकना है 🙏 जो भी विशुद्ध सांस पर मन टिका लेगा बोधि को प्राप्त हो जाएगा😂
19. परंतु मूर्ख रविदासिया संतो ने,
हरि-हरि नाम से गुट बना लिया है.....
सो-हम नाम से गुट बना लिया है.....
राम-राम नाम से गुट बना लिया है.....
जल्दी ही कोई सिर फिरा मुकंद-मुकंद नाम से भी गुट बना लेगा 😂
20. कबीर-पंथी सहजयोग के सहारे काम करते हैं, फिर भी उन्हें 1 घंटे ध्यान में बैठना बड़ा कष्ट कारक लगता है......
वह बाणी विलास में ज्यादा आनंद लेते हैं....
कबीर ने जब जाना तब मूर्खो को गरियाया.....
परंतु कबीर भक्त निंदा रस में बहुत आनंद लेते हैं.....
निंदा रस का आनंद लेते-लेते जेल चले जाते हैं
श्री रामपाल जी, के भक्त उनको कबीर का पुनर्जन्म कहते हैं😂
संत रामपाल जी अच्छे पंडित है, कबीर वाणी पर उनकी गहरी पकड़ है, परंतु बोधि से उन्होंने एक भी नए छंद की उत्पत्ति नहीं की है 🙏
21. इसी प्रकार इलाहाबाद में कबीर के भक्त श्री धर्मेंद्र जी है, उनके सामने आप कुर्सी पर नहीं बैठ सकते😂 क्योंकि वह ज्ञानवान है 🙏मूर्खता की पराकाष्ठा है, मानवता का संदेश देने वाले, गुरु के भक्तों ने, अमानवीता का संसार रच दिया 😂
कोई संत निकालकर नहीं आता जो मेरा हाथ बटाए, क्योंकि 1 घंटे विशुद्ध सांस के साथ बैठना बड़ा कठिन है 😂
आज तो मेरा मन ही नहीं टीका........
और निंदा रस का लेख लिख डाला.......
साधक कमलेश कुमार मित्रा @ 9335122064
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